अजमेर, 25 दिसम्बर। महर्षि दयानंद सरस्वती विश्वविद्यालय का त्रयोदश दीक्षांत समारोह गुरुवार को विश्वविद्यालय के सत्यार्थ सभागार में गरिमामय एवं भव्य वातावरण में आयोजित हुआ। समारोह की अध्यक्षता राज्यपाल एवं कुलाधिपति हरिभाऊ बागडे ने की। कार्यक्रम का शुभारंभ दीप प्रज्वलन एवं विश्वविद्यालय गीत के साथ हुआ। राज्यपाल ने कहा कि दीक्षांत समारोह विद्यार्थियों के जीवन में एक नए आरंभ का प्रतीक है और उपाधि प्राप्त करना ही अंतिम लक्ष्य नहीं होना चाहिए, बल्कि इसके साथ बौद्धिक क्षमता, नैतिक मूल्यों तथा राष्ट्र के प्रति दायित्वबोध का विकास भी आवश्यक है। उन्होंने इसे प्राचीन भारतीय समावर्तन संस्कार से जुड़ा बताया, जिसमें गुरु शिष्यों को सत्य, धर्म और विनम्रता का संदेश देते थे।
राज्यपाल एवं कुलाधिपति हरिभाऊ बागडे ने विभिन्न संकायों के 54 शोधार्थियों को विद्या वाचस्पति (पीएचडी) की उपाधि प्रदान की। इसके साथ ही वर्ष 2020 से 2025 के मध्य उत्कृष्ट शैक्षणिक प्रदर्शन करने वाले 2 विद्यार्थियों को कुलाधिपति पदक तथा वर्ष 2023, 2024 एवं 2025 में सर्वाधिक अंक प्राप्त करने वाले 40 विद्यार्थियों को स्वर्ण पदक प्रदान कर सम्मानित किया गया।
राज्यपाल ने अजमेर के ऐतिहासिक महत्व का उल्लेख करते हुए कहा कि इसका प्राचीन नाम अजयमेरु रहा है, जिसकी स्थापना चौहान शासक अजयराज ने की थी। उन्होंने महर्षि दयानंद सरस्वती को युगपुरुष बताते हुए ‘वेदों की ओर लौटो’ के संदेश को आज भी प्रासंगिक बताया। उन्होंने शिक्षा को व्यवहार से जोड़ने, चरित्र निर्माण, आत्मविकास, ब्रह्मचर्य, योग, प्राणायाम, वेद-उपनिषद, मातृभाषा एवं संस्कृत के अध्ययन पर बल दिया।
उन्होंने विद्यार्थियों से आह्वान किया कि वे अपनी शिक्षा का उपयोग राष्ट्र निर्माण में करें और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संकल्प के अनुरूप वर्ष 2047 तक भारत को विकसित राष्ट्र एवं विश्वगुरु बनाने में सक्रिय भूमिका निभाएं। उन्होंने कहा कि विश्वविद्यालय परिसरों में शोध एवं प्रयोगशालाओं की भूमिका महत्वपूर्ण है तथा व्यक्ति का बौद्धिक विकास उसके कार्य और व्यक्तित्व से परिलक्षित होता है। साथ ही उन्होंने खेलकूद, नैतिकता, पर्यावरण संरक्षण तथा वृक्षारोपण का संदेश दिया। इस अवसर पर उन्होंने बृहस्पति भवन के सामने स्थित दो उद्यानों का नामकरण ‘एक भारत श्रेष्ठ भारत विहार’ एवं ‘संस्कृति विहार’ करने की घोषणा की।
विधानसभा अध्यक्ष वासुदेव देवनानी ने कहा कि दीक्षांत समारोह वह क्षण है, जब विद्यार्थियों के सपनों को औपचारिक मान्यता मिलती है। शिक्षा मानव को सत्य के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देती है। उन्होंने तकनीक और कृत्रिम बुद्धिमत्ता के युग में भारतीय ज्ञान परंपरा, नैतिक मूल्यों और संवेदनशीलता को बनाए रखने की आवश्यकता पर जोर दिया।
जल संसाधन मंत्री सुरेश सिंह रावत ने कहा कि यह दीक्षांत समारोह भारत की प्राचीन शिक्षा परंपरा का गौरवशाली उदाहरण है। उन्होंने विद्यार्थियों से कहा कि उपाधि मंजिल नहीं बल्कि उड़ान की शुरुआत है और बदलते समय में समाज व राष्ट्र की आवश्यकताओं के अनुरूप नवाचार एवं अनुसंधान पर कार्य करना आज की आवश्यकता है।